Gangotri,Uttrakhand,गंगोत्री , उत्तराखंड , मां गंगा की गोद में ..........

तो धनौल्टी और टिहरी से होते हुए हम उत्तरकाशी पहुंचे । शाम हो चुकी थी और हमने दोपहर में कुछ भी नही खाया था मसूरी से नाश्ता जो करके चले तो बस कहीं कुछ खाया नही । उत्तरकाशी पहुंचकर हमने वहां के बस स्टैंड से केले लिये और चार चार केले खाये ये सोचकर कि अब तो बस गंगोत्री जाकर ही खाना खायेंगे । उत्तरकाशी से फिर से बाइक दौडा दी और मनेरी और भटवारी होते हुए उत्तरकाशी पहुंचे । रास्ते में हरसिल और सुखी तोप नाम की जगहे भी पडती हैं । सुखी तोप से कुछ पहले आशु की बाइक में तेल खत्म हो गया । टैंक पूरा भरवाया था पर 13 लीटर के टैंक इतनी जल्दी खाली कैसे हो गया ये समझ में तब आया जब देखा कि उसकी टंकी का ढक्कन ढीला हो गया था । कोई पेंच वगैरा ऐसा ढीला हो गया था कि जिसकी वजह से ढक्कन काफी ढीला था और पैट्रोल केा अगर खुला मिले तो वो उड जाता है सो तेल उड रहा होगा सुबह से या पता नही कब से पर हमें पता ही नही चला । वो तो शुक्र था कि मेरी बाइक में सात आठ ली0 तेल अभी बचा था उसमें से दो लीटर तेल निकालकर उसकी बाइक में डाला और उसके बाद हमने रास्ते में जगह जगह पूछना शुरू कर दिया कि पैट्रोल कहां मिल सकता है । कई लोगो ने बताया कि या तो सुखी तोप या फिर हर्सिल में ही मिल सकता है और वो भी फौजियो के पास ही मिलेगा बाकी आगे कोई पंप वगैरा नही है । हम सोच रहे थे कि क्यों नही हमने उत्तरकाशी में ध्यान दिया कि तेल कितना है । बजाज बाक्सर काफी पुरानी बाइक थी और उसमें तेल दिखाने वाली मीटर नही होता था ।
और ये पतली बारीक सी लकीर जैसी नदी

उत्तरकाशी आने का रास्ता भी खराब था और उत्तरकाशी से गंगोत्री तक का रास्ता भी कोई ज्यादा अच्छा नही था । जगह जगह बरसात की वजह से गढढे हो चुके थे और खुदा ना खास्ता जब भी कोशिश करने के बावजूद कभी गढढे में पहिया गिर जाता था तो इतना लम्बा सफर करने और आज के दिन तो पूरा दिन बाइक पर बैठे रहने के कारण बडा दर्द महसूस होता था । इस बीच कई जगह पूछा पर पैट्रोल नही मिला तो हमने सोचा कि जो होगा देखा जायेगा और गंगोत्री की ओर चलते गये जब हम गंगोत्री पहुंचे तो अंधेरा हो गया था और कांवड यात्रा होने के कारण डाक कांवड वाली टाटा 407 गाडियो की लाइन की वजह से कई किलोमीटर पहले से जाम लगा था
मंदिर का एक दृश्य
बाइक तो कहीं ना कहीं को निकल ही जाती है सो आधा घंटे से ज्यादा में हम उस जाम से आगे निकलकर गंगोत्री में आ गये । अंधेरे में ज्यादा कुछ दिखाई नही दे रहा था तो कुछ दूर आते ही हमने होटल देखना शुरू कर दिया पर यहां हमारे हाथ पहली ही बार में एक गेस्ट हाउस लग गया जो देखने में तो धर्मशाला जैसा ही लग रहा था । अंधेरा हो चुका था और ठंड भी बहुत थी हमारा इरादा ज्यादा भागदौड होटल या रूकने के लिये करने का नही था । हम तो बस सोना चाहते थे । भूख भी लगी थी । उस गेस्ट हाउस में 4 बैड का कमरा 400 रू में मिल रहा था । उसे ले लिया और पास में ही एक रेस्टोरेंट जो कि अस्थायी तौर पर बना हुआ था में खाना खाया क्योंकि दूर जाने या कहीं भी जाने की किसी की कोई इच्छा या स्थिति नही थी ।
मंदिर के पास दिखती उंचे पहाडो की चोटियां
खाना खा पीकर हम सो गये और सुबह सवेरे ही उठ गये । उठकर देखा तो उस गेस्ट हाउस में बाकी सारे कमरे एक ग्रुप ने ही ले रखे थे । वे लोग खाना बना रहे थे और अपने सारे लोगो के लिये उन्होने सारे कमरे बुक कर रखे थे । उनके हलवाई उनके साथ थे । हम कमरे के बाहर निकले तो हमें भी उन्होने गर्म गर्म बढिया चाय एकदम से दे दी ।
धर्म का झंडा उंचा रहे

उनके लोगो के अलावा उपर नीचे सारे गेस्ट हाउस में हम अकेले ही थे । चाय पीकर हमने मंदिर जाने की सोची । फ्रेश होने के लिये गये तो क्या कहूं आपसे कि पानी इतना ठंडा था कि हाथ धोना भी मुश्किल था । सोचा कि अब क्या करें फिर उन्ही हलवाईयो की भटटी में पानी गर्म हो रहा था जिसमें से थोडा पानी लेकर हमने हाथ मुंह धो लिये । बाकी लोगो में से ज्यादातर ऐसा ही कर रहे थे । आशु बोला कि मै तो गंगा जी में ही नहाउंगा । सबने मना किया कि भाई पानी बहुत ठंडा है मान जा बोला नही मै तो सात डुबकी लगा सकता हूं । बस चल दिये मंदिर की ओर ---------------
मंदिर के सामने एक फोटो
गंगोत्री प्राचीन काल से हिंदुओ की श्रद्धा का केन्द्र रही है । गंगोत्री से निकलने वाली गंगा को मां का दर्जा हिंदू धर्म में दिया गया है ऋषि मुनियो में तो गंगोत्री साधना स्थली के रूप में प्रसिद्ध रही है । गंगोत्री उत्तराखंड के चार धामो में से एक है पुराणो ,शास्त्रो के अनुसार राजा सगर ने देवलोक पर विजय पाने के लिये यज्ञ किया पर यज्ञ का जो घोडा था वो इंद्र ने चुरा लिया । राजा सगर के सारे पुत्र घोडे को खोजने निकल पडे । घोडा मिला पाताल लोक में एक ऋषि के समीप बंधा था और ऋषि् तपस्यारत थे । राजा सगर के पुत्रो ने ऋषि को घोडे की चोरी के लिये जिम्मेदार मानकर ऋषि का अपमान किया इस पर ऋषि क्रोध मे आ गये और उन्होने शाप देकर राजा सगर के 60 हजार पुत्रो को जलाकर भस्म कर दिया । चूकि उनका अंतिम संस्कार नही हुआ था सो उनकी आत्माऐं भटकने लगी । राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने अपने पूर्वजो के उद्धार का निश्चय किया इसके लिये गंगा को धरती पर लाना जरूरी था ताकि उनके पूर्वजो की राख को गंगा में प्रवाहित किया जा सके और उनका अंतिम संस्कार होकर उन्हे मुक्ति प्राप्त हो जाये ।
गंगोत्री का एक नजारा
भगीरथ ने ब्रहमा जी की कठिन तपस्या कर उनसे गंगा को धरती पर लाने की इच्छा प्रकट की । ब्रहमा जी ने गंगा को आदेश दिया तो गंगा ने कहा कि इतनी उंचाई से गिरने से धरती मेरा वेग सहन नही कर पायेगी ।तब भगीरथ ने भगवान भोले शंकर से निवेदन किया कि वो अपनी जटाओ में गंगा जी का प्रवाह रोक लें और भोले शंकर ने ऐसा ही किया और गंगा का धरती पर अवतरण गंगोत्री में हुआ और राजा सगर के साठ हजार पुत्रो की आत्मा को मुक्ति प्राप्त हुई गंगोत्री वो जगह है जो गंगा का उदगम स्थल बना ।
स्नानार्थियो की भीड
वर्तमान में यह उदगम स्थल लगभग 22 किलोमीटर दूर गौमुख तक पहुंच गया है । यहां एक ग्लेशियर जिसे गौमुख ग्लेशियर भी कहा जाता है से गंगा की छोटी सी धारा निकलती है । यहां जाने के लिये गंगोत्री से सुबह सुबह निकलना पडता है और शाम तक वापस आना पडता है । हम गौमुख नही गये । गंगोत्री समुद्र तल से 3140 मी0 की उंचाई पर राष्ट्रीय राजमार्ग ऋषिकेश —गंगोत्री पर उत्तरकाशी से 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । गंगोत्री मंदिर का निर्माण 18 वी शताब्दी की शुरूआत में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्धारा किया गया था ,वर्तमान मंदिर बीसवी सदी में जयपुर नरेश माधोसिंह ने बनवाया था ।
गंगोत्री का एक और दृश्य
यह जयपुरी शैली में एकादश रूद्र मंदिर है । बीस फीट उंचा मंदिर सफेद रंग के चित्तीदार ग्रेनाइट को तराशकर उत्तराखंड की पगोडा शैली में बनाया गया है । मंदिर के गर्भगृह में गंगा यमुना की स्वर्ण व चांदी के आभूषण युक्त मूर्तिया हैं । शंकराचार्य , अन्नपूर्णा ,सरस्वती ,शंकर और गणेश की भी मूर्तिया हैं मंदिर की सीढियां उतरते ही भगीरथ शिला स्थित है
एक फोटो जल का , बरसात के कारण मटमैला रंग हो गया है
प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर के महीनो के बीच लाखो श्रद्धालू यहां आते हैं । बाकी समय मंदिर बंद रहता है और मां गंगा की पूजा मुखबा गांव में होती है । वैसे यहां स्थानीय लोगो ने इस स्थान के नाम का शाब्दिक अर्थ बताया गंगा उतरी यानि जहां गंगा उतरी वो गंगोत्री । यहां से दो शानदार ट्रेकिंग के शौकीनो के लिये प्वाइंट हैं एक गौमुख और दूसरा केदारताल । जिसके लिये गंगोत्री को बेस बना सकते हैं क्योंकि यहां खच्चर ,कुली,गाइट , होटल,धर्मशाला सब चीजो की सुविधा है । गंगा यहां पर भगीरथी है और जब यहां से चलकर बद्रीनाथ की अलकनंदा में मिल जाती है तो गंगा हो जाती है । गंगा यहां से चलकर गंगासागर में जाकर सागर में मिल जाती है । इसीलिये कहते हैं कि सारे तीर्थ बार बार गंगासागर एक बार । जल्द ही आपको गंगासागर की भी यात्रा कराउंगा ।
पीछे हैं चीड के पेड और उनके फूल

मंदिर पहुंचने के रास्ते में कुछ दूर पहुंचने से पहले तक दोनो ओर दुकाने लगी हुई हैं । जिनमें प्रसाद के अलावा गंगाजल लाने के लिये खाली कैन सबसे ज्यादा बिकती हैं । हमने भी यहां से कैन ली और दर्शनो के बाद जब वापिस चले तो इनमें गंगाजल भरकर अपने घर लेकर आये । तो मंदिर पहुंचने पर मंदिर के सामने ही गंगा जी या भगीरथी अपने पूरे वेग में बह रही थी और बरसात होने के कारण पानी का रंग मटमैला था । क्योंकि बरसात में पहाडो की मिटटी भी इसमें घुल जाती है । कांवडियो की भीड तो ज्यादातर गौमुख के लिये प्रस्थान कर चुकी थी और मंदिर में ज्यादा भीड नही थी ।
ये घाटी तो देखिये
मंदिर के सामने बने घाट पर श्रद्धालु स्नान कर रहे थे और हम सबने आशु को उसकी शर्त की याद दिलाई । आशु ने और हम सबने गंगाजल हाथ में लिया । कुछ तो मौसम ठंडा और कुछ बर्फ जैसा जल आशु की हिम्मत सात तो क्या एक भी डुबकी लगाने की नही हुई । हालांकि हमारे सामने ही कुछ बुजुर्ग लोग ऐसे डुबकी लगा रहे थे कि मानो गर्म पानी में नहा रहे हों । मुझे याद है गंगा हमारे मनो में ऐसे बस गई है कि दो बात हम कभी भूल नही पाते एक तो गंगाजल कभी खराब नही होता । बचपन से अपने घर में हमेशा गंगाजल रखा देखा है और वास्तव में वो कभी खराब नही हुआ । दूसरा गंगोत्री की तो बात छोडिये हरिद्धार में भी आप जून की गर्मी में नहाकर देखिये आपको सुबकी आ जायेगी तो पापा की सीख याद आती है कि सूरज निकलने से पहले उसी जल में नहाकर देखो तो वो इतना ठंडा नही होता ।
पुल से एक नजारा
सबने हाथ मुंह धोकर और अपने उपर छींटे डालकर नहाने की इतिश्री कर ली । और मंदिर में पहुंचे । दर्शनो में ज्यादा भीड ना होने के कारण धक्का मुक्की नही थी । दर्शन बडे प्यार से हुऐ और दर्शनो के बाद हम आस पास के क्षेत्र में घूमें । भागीरथ शिला और सूर्य कुंड देखे । गंगोत्री में ही गंगा कई तरह से दिखाई देती है । मंदिर के सामने बिलकुल मंदिर के थोडी ही नीचे जबकि थोडा आगे चलते ही गहराई में जानी शुरू हो जाती है आप फोटोज में देख सकते है कि कैसे मंदिर के सामने बहती हुई गंगा थोडी दूर में ही इतनी गहरी घाटी में पहुंच जाती है ।
पहाडो की गोद में बसा एक शहर
वहां चीड के पेडो पर लगे चीड के फूल जो कि लकडी के फूल होते हैं और आम धारणा है कि इन्हे घर में रखने से सांप नही आते तो उन चीड के पेडो के पास भी फोटो खिचाये । चीड का फूल भी कुदरत का एक करिश्मा है जो लकडी का बना हुआ ऐसी कला होती है कि कोई कारीगर उसे बडी मेहनत से ही बना सकता है ।
ये नजारा देखिये

दूसरी साइड से











पीछे गंगोत्री का भी नजारा
पुल के नीचे एक फोटो हमारा भी
घाटी में प्रवेश करती गंगा
दर्शन करने के बाद वापिस अपने ठिकाने पर जाने से पहले हमने गंगोत्री में भी कई जगह पैट्रोल के लिये पूछा पर सबने यही कहा कि हरसिल या सुखी तोप में ही ट्राई करो वहीं मिल सकता है । तो हमने वापिस आकर देखा कि बाइक में कितना तेल बचा है । मेरी बाइक में अभी 6 ली0 तेल बचा था जिसमें से दो लीटर फिर से मैने आशु को दिया और चल पडे वापिस पैट्रोल को ढूंढते हुए केदारनाथ के लिये ...........................

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