Sarnath

पहले हम सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार में पहुंचे । ये मंदिर नया बनाया गया है और इसे महाबोधि सोसाइटी ने बनवाया है । मंदिर के अंदर काफी सुंदर चित्रकारी दीवारो पर हुई है और दर्शको से शांति बनाये रखने की अपील की जाती है । अंदर बुद्ध की सोने की या सोने जैसी मुझे पक्का पता नही , मूर्ति है जिसको आप फोटो में देख सकते हो और एक घंटा मंदिर के गलियारे में है । यहां फोटो खींचने पर कोई पाबंदी नही थी और फीस के बारे में लिखा था कि आप फीस को दान पात्र में डाल दें यानि अपनी श्रद्धा से

इस जगह पर महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम बरसाती मौसम बिताया था ।
यहां पर काफी भीड भाड रहती है और ज्यादातर जैन धर्म के मानने वालो के अलावा और धर्मो के लोग भी आते हैं । जैन धर्म के मानने वाले लोग जहां इस जगह पर आकर भक्ति में लीन हो जाते हैं वहीं हमारे जैसे तो सिर्फ घूम घामकर वापिस चल देते हैं । यहां पर जैन मंदिर भी है और वो इस मंदिर और धमेक स्तूप के बीच में है और दोनो जगह से दिखाई देता है सारनाथ महात्मा बुद्ध की कर्मभूमि है और उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण तीर्थ और पर्यटक स्थल है ।


बिहार के बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने सारनाथ के इसी जगह पर प्रथम उपदेश दिया था जिसे धर्मचक्र परिवर्तन के नाम से जाना जाता है । अपनी मृत्यु के समय महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियो को लुम्बिनी , बोधगया और कुशीनगर के साथ साथ सारनाथ को अत्यंत पवित्र स्थान बताया था । यहां पर स्थित स्तूप को सम्राट अशोक ने बनवाया था ।


सारनाथ में हम पहुंचे धर्मराजिका स्तूप जिसके अब केवल अवशेष् हैं । यहां जाने के लिये अब पक्का याद नही पर 5 या 10 रू का टिकट लेना पडता है । अंदर सुंदर पार्क के साथ बौद्ध धर्म के अवशेषो के रूप में कुछ नींव जैसे खंडहर बचे हुए हैं और स्तूप को गेट से घुसने पर देखोगे तो बहुत छोटा सा दिखाई देगा । यहां चारो ओर घूमने के लिये एक पथ बना हुआ है । यहीं पर बुद्ध ने उपदेश दिया था । इसे धमेक स्तूप भी कहते हैं ।धमेक स्तूप के पार्क में काफी संख्या में देश और विदेशो के लोग थे जिनमें से ज्यादातर बौद्ध धर्म के मानने वाले थे और वो समूह में थे किसी समूह ने बौद्ध भिक्षुओ जैसे कपडे पहन रखे थे तो किसी ने सफेद वस्त्र पहन रखे थे उनकी भाषा भी हमें समझ नही आ रही थी पर उनमें से ज्यादातर के हाथ में माला थी और वो एक किताब का पाठ कर रहे थे यह सारनाथ की सबसे आकर्षक संरचना है । सिलैंडर के आकार के इस स्तूप का आधार 28 मीटर है और इसकी उंचाई 43 मीटर । धमेक स्तूप को बनवाने में ईंट और रोडी पत्थरो का बडी मात्रा में इस्तेमाल किया गया है । स्तूप के निचले भाग में शानदार फूलो की नक्काशी की गई है । यहां आने से पहले हमने कुछ कुछ ऐसा ही एक और स्तूप रास्ते में देखा पर उस पर उतरे नही । शायद वो चौखंडी स्तूप था ।


मूलगंध कुटि विहार में एक जानवरो का पार्क भी है और यहां से हम गलती से पहले धमेख स्तूप के पिछवाडे को ही सही और इसी तरह से मानकर फोटो खिचवाकर चल पडे वो तो जिसे पार्क समझ कर घुसे वो धमेक स्तूप का अगाडा निकला । धमेक स्तूप के पास में ही संग्रहालय था जिसे हम देखने नही गये क्योंकि अब संग्रहालय देखते देखते उब चुके थे । सो हम उसके बजाय वहां स्थित जापानी मंदिर देखने गये ।



जापानी मंदिर में बिल्कुल शांति थी और वहां हमारे अलावा बस एक आदमी और था बाहर का । जापानी मंदिर में बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा बडी ही सुंदर तरीके से बनी हुई है । और मंदिर के बाहर का डिजाइन जापानी स्टाइल में है ।


वाराणसी या सारनाथ पहुंचने के लिये निकटतम एयरपोर्ट कसिया में है जो कि 5 किमी0 है और गोरखपुर एयरपोर्ट 46 और लखनउ एयरपोर्ट 252 किमी0 और वाराणसी का बाबतपुर हवाई अडडा 22 किमी0 है वाराणसी कैंट और मुगल सराय यहां आने के लिये सबसे बडे रेलवे स्टेशन हैं । मुगल सराय तो काफी बडा जंक्शन है अगर आपको वाराणसी की ट्रेन ना मिले या जगह ना मिले तो आप कलकत्ता रूट पर जाने वाली ट्रेनो में ट्राई करो जिसमें मुगल सराय पर जगह मिले तो एक घंटे का मामूली सा आटो का सफर तय करके आप वाराणसी और सारनाथ पहुंच सकते हो । सडक मार्ग से यहां पहुंचने के लिये बहुत विकल्प उपलब्ध हैं लखनउ , इलाहबाद और दिल्ली से यहां के लिये सीधी और हर तरह की बसे चलती हैं


सारनाथ वाराणसी से सिर्फ 10 किलोमीटर दूर है और इसी वजह से यहां होटल आदि ज्यादा नही है क्योंकि 10 रू किराया देकर वाराणसी जैसी जगह में सस्ते से सस्ते और महंगे ताज जैसे होटल में भी ठहरा जा सकता है



अपने एक दूसरे प्रवास में मै जब वाराणसी गया हुआ था तो मेरे पास एक दिन का समय था जो मै घूमने के लिये बिता सकता था । इस बार लवी की बजाय मेरे एक मित्र मेरे साथ थे और दीवाली से पहले श्राद्ध के दिन चल रहे थे । मेरे मित्र की इच्छा थी कि श्राद्ध के इस माहौल में हिंदुओ में सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण जगह जहां अपने पूर्वजो का श्राद्ध कर्म किये जाने से वे सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं उस गया जी को जो कि यहां वाराणसी से ज्यादा दूर नही है एक बार हम हों आये और अगर मौका मिले तो श्राद्ध कर्म भी कर आयें । उनकी सलाह मानकर हमने सुबह सवेरे चार बजे गया जी के लिये वाराणसी से प्राइवेट बसे चलती हैं स्टेशन के सामने से वे पकडी और आठ बजे तक गया जी पहुंच गये ।




गया जी में जाते ही स्टेशन की सीढी उतरने से पहले ही हम पकड लिये गये पंडो द्धारा । श्राद्ध के दिन और गया जी में पितृपक्ष मेला लगा था । जगह जगह टैंट लगे थे औरहर आदमी हमसे बस यही पूछ रहा था कि आप कहां से आये हो कौन बिरादरी हो । जब हम ज्यादा घिर गये तो हमें बताना पडा और फिर क्या था निवास और गोत्र का नाम सुनते ही कुछ तो छिटक गये और तीन चार पंडो ने हमें बंदी बना लिया कि आपके पंडा तो हम हैं । मैने पूछा वो कैसे कि आपका इलाका हमारे अंर्तगत आता है तो मैने पूछा कि फिर क्या करना है बोले चलो गददी पर । एक आटो में बिठाकर एक पुरानी सी हवेली में ले गये । इन पंडा जी का नाम था पीतल किवाड वाले पंडा और हमारे जाने के बाद इन्होने पूरी अपनी पत्री ख्ंगाल दी पर हमारे बाप दादाओ तो क्या हमारे गांव तक के किसी का नाम नही मिला । मिलता भी कैसे किसान आदमी हम कहां इतने चक्करो में पडते हैं खैर अब पंडित जी सोच रहे थे कि क्या बताये हमें पर हमने सोचा कि अगर हम अपने पंडा को ढूंढेगे तो पता नही कब मिलें । पंडा पंडा सब एक समान तो हमने उन्ही से पूछा कि कोई बात नही तुम ही बता दो कि कैसे कैसे होगा श्राद्ध तर्पण आदि । अब पंडित जी ने जो पैकेज बताये उसमें सबसे सस्ता 1100 रू का था और सबसे महंगा लाखो रू का जिसमें गाय दान से लेकर 13 दिन तक वहीं रहना था । हमने 1100 वाले को भी देा का हवाला देकर 800 रू प्रति व्यक्ति के हिसाब से करा लिया बस उसके बाद एक पंडित जी हमारे साथ कर दिये गये जिनके पास पूजा से लेकर पंडित जी को दान में दी जाने वाली गीता माला सब रेडीमेड मौजूद थी ।

गया जी में एक नदी है जिसके बारे में बडी रोचक बात पता चली जो पंडित जी ने बताई और मै आपसे साझा करना चाहूंगा कि जब राम वनवास काट रहे थे तो पितृपक्ष के दिन राम वन में गये थे इतने में दशरथ जी जो कि स्वर्गवासी थे उन्होने अपना श्राद्ध स्वरूप दिया जाने वाला भोग मांगा । चूकि राम वन में गये थे इसलिये सीता जी ने उनको वो दे दिया । कहते हैं कि उस वक्त उस घटना को जिन्होने देखा उसमें एक गाय , एक पंडित एक वृक्ष और वहां बह रही नदी थी । जब राम वन से आये तो सीता ने उन्हे बताया तो राम ने पूछा कि क्या तुम मुझे प्रमाण देागी कि तुमने मेरे पिता को उनका हक दिया है तो सीता ने इन चारो से गवाही देने को कहा । अब पंडित ने सोचा कि मुझे दक्षिणा तो मिली नही इसलिये वो मुकर गया और नदी और गाय भी झूठ बोल गये पर वृक्ष ने सच बोला । इसलिये सीता ने पंडित को श्राप दिया कि कलयुग में तुम भीख मांगोगे और गाय को कहा कि कलयुग में तुम मल और मल जैसी वस्तुए भी खाओगी । इसी तरह उस नदी को श्राप दिया कि तुम गायब हो जाओगी और वृक्ष को आर्शीवाद दिया कि तुम अमर रहोगे तो आज भी मंदिर परिसर में वो वृक्ष इसी तरह से विराजमान है और सूखा नही है । सामने बह रही नदी जो कि आप फोटो में देखोगे उसमें मामूली सा पानी है बाकी आप कहीं भी हाथ से एक मुठठी रेत निकालो वहीं पानी मिलेगा यानि की नदी रेत के नीचे है ।बाकी देा का क्या हुआ वो आप सब अच्छी तरह जान सकते हो वो मै कहना नही चाहूंगा । ये कथा मुझे उन पंडित जी ने सुनाई और बडे विधि विधान से सब कार्य कराये बाद में कुछ एक्सट्रा टिप्स यानि धनलाभ लेकर वे विदा हुए और हम भी अपने घर वापिस आये ये छोटी सी सीरिज की समाप्ति करूंगा इसी के साथ आपकी प्रतिक्रियाओ का इंतजार रहेगा

2 comments:

  1. वाह...मन प्रसन्न हो गया आपकी प्रस्तुति देखकर...बहुत बहुत बधाई...

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  2. धन्यवाद चतुर्वेदी जी ..........आपका आभार

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